मोहन आलोक की कविताएं

कविता
कविता कोई पत्थर नहीं है
कि आप मारें
और सामने वाला हाथ ऊंचे कर दे
साफा उतारे
और आप के पैरों में
रख दे ।

कविता का असर
तन पर नहीं
मन पर होता है
मन की जंग लगी तलवार को
यह
पानी दे-दे कर धार देती है
उसे धो-पोंछ कर
नए संस्कार देती है

यह वक्त के घोड़ों को लगाम
और सवारों के लिए
काठी का बंदोबस्त करती है
यह हथेली पर
सरसों नहीं उगाती
बल्कि उसे उगाने के लिए
जमीन का बंदोबस्त करती है ।
***

रचना
वह रचता है
और जब रच देता है
तो उस रचना में
रचने के लिए -
कुछ भी शेष नहीं बचता है ।

हो सकता है
वह रचना
आपको अधूरी सी लगती रहे
और उसकी पूर्णता हेतु
आपके भीतर
कोई जिज्ञासा जगती रहे ।
हो सकता है
आप किसी अन्य रचना के साथ
उसका मिलान करते रहें
और यों
अपने आपको नाहक परेशन
करते रहें ।

लेकिन वह रचना
जैसी भी होती है
जोअ भी होती है
पूरी होती है ।

कोई भी रचना
किसी अन्य रचना के सदृश्य
कब जरूरी होती है ?
***

शब्द होती है कविता
शब्द
जब असमर्थ हो जाते हैं
अर्थ देने में
तो पंक्ति रची जाती है

पंक्ति,
जब व्यर्थ हो जाती है
भावना की भूमि पर
तो कहानी कही जाती है

कहानी,
जब कह नहीं पाती है
अपने भीतर की कहानी,
तो कविता आती है
और अपने
बिम्बों,
प्रतीकों,
उपमाओं के माध्यम से
अर्थ को पहुंच कर
एक शब्द बन जाती है ।
***

कविता में
कविता में
ढूंढ़नी हो यदि आपको
कोई गहरी चीज

तो कमीज
उतारो और लगाओ उस में
एक डुबकी

डुबकी,
तो आपको आएगी
जब आप की गर्म-मिजाज देह
कविता के
ठण्डे पानी में जाएगी ।
पर डूबो आप
जितनी देर डूब सकते हो
इस ताल में
सांस रोक कर कपाल में,
और जाते रहो
शब्दों की श्रृंखला पकड़ कर
गहरे
गहरे
और
गहरे,
कि आपको वापिस निकलने का
ध्यान ही न रहे
और आपका मन
आप कविता में हैं
यह भी न कहे ।
***

शांति गीत
आओ ।
हम एक शांति गीत
गुनगुनाएं
और गाते-गाते
इतिहास बन जाएं ।
एक ऐसा इतिहास
लिसके सामने
सूरज की रोशनी भी
मंद हो जाए
एक ऐसा इतिहास
जिसके बाद
इतिहास बनना ही बंद हो जाए ।
***

चिड़या की बोली लिखो
चिड़या की बोली लिखो
फूल का रंग लिखो
निःशब्द ।

कलम कोअ आंखों से पकड़ो
बनाओ
आकाश को कागज ।

नजर को तीर की तरह गड़ाओ
और बींध दो
बादलों के पीछे के
बादल
उन बादलों के भी
पार के बादल ।

चिड़या की बोली लिखो
फूल का रंग लिखो
निःशब्द ।
***

फूल के करीब जाइए
फूल के करीब जाइए
और उससे
अपने मन की बात कहिए
जबाब आने की प्रतीक्षा कीजिए
कुछ देर को
उसके पास बैठे रहिए ।

वह अपनी
मिल-बतियाने की भूख को
निश्चय ही शांत करेगा
बहलाएगा आपका मन
आपसे बात करेगा ।

एक बार कभी
आप उसकी बात सुनकर तो द्रेखें

उसके चतुर्दिक मंडराते मौन को
गुनकर तो देखें ।
हो सकता है
शुरू-शुरू में आपको लगे
आप बेवकूफ बन रहें हैं !
तब भी आप
एक बार यों बेवकूफ बनकर तो देखें ।
***

हम कला के पारखी
शिल्प पूजते हैं
शिल्प में ढली
सर्जना पूजते हैं,
हम कला के पारखी
पत्थर कब पूजते हैं ?

सत्य पूजते हैं
हम मनुष्य की साधना पूजते हैं
सत्य को साकार करती हुई
उसकी कल्पना पूजते हैं ।

हम कला के पारखी
पत्थर कब पूजते हैं ?
***

ख्याल
यह जो हम
दिन ब दिन
नीचे से नीचे की ओर
      जा रहे हैं
इससे स्पष्ट है
कि कहीं ऊंचाई से आ रहे हैं ।
ये ऊंचाई
जो कि उजालों की ऊंचाई है ;
दरसल
हमारे ख्यालों की ऊंचाई है ।
और ये ख्याल
हमारे कवियों
साहित्यकारों के
खून पसीने की कमाई है ।
***

मैं हूं जब तक
मेरी कविता और
आप के बीच में
मैं हूं जब तक !
यह, आपको मुश्किल से ही
पसंद आएगी तब तक ।

अभी मैं
नश्वर और अनश्वर के बीच में
एक दीवार हूं
कविता से पहले
आपके सामने एक प्रश्न हूं
प्रश्न !
जो आपकी सोच को
प्रभावित करता है एक हद तक ।
जब मैं नहीं होऊंगा
तो यह, आप की चीज हो जाएगी
आप इस में खो जाएंगे
यह आप में खो जाएगी ।
अर्थ ढूंढेंगे आप
इस के एक एक शब्द के लिए ।

जब तक इसके साथ
इसके मेरी होने का विचार
जुड़ा हुआ है
तब तक
यह समझना चाहिए
कि एक विकार जुड़ा हुआ है
यह विकार है
कौन जाने कब तक ?
***

रो कवि, रो !
रो भाई, रो
लगातार रो
जैसे कि हम रो रहे हैं-

रात को, दिन को
अंधेरे को, उजाले को
गर्मी को, पाले को
अमीय को, विष को
तृप्ति को, तृष्णा को
रो
कि रोना ही
अपनी नियति है

रो
कि इस रोने में ही
मनुष्यता की गति है
रो !
कवि रो !!
कि तुमहारे रोने में
और आम आदमी के रोने में
बहुत फर्क है

रो !
कवि रो !!
कि तुम्हारे रोने से ही
सुरक्षित है
आने वाली पीढ़ियों का हर्ष ।
***

आप
आप क्या सोचते हैं
कि आप के करने से
कुछ नहीं होगा !
और यह हवा
जैसे बह रही है
वैसे ही बहती रहेगी ?
तो सुनों !
आपका यह सोचना ही
इन सब बुराइयों की जड़ है ।
आप ही हैं
इन सब बुराइयों के शीर्ष पुरुष
शेष दुनियां तो धड़ है ।
आप जैसे
एक-एक-एक
मिलकर ही हुए हैं ये अनेक
मनुष्य के कलेजे के छेक ।

आप एक !
सिर्फ एक !!
जिस दिन इन बुराइयों को
बिना किसी के
साथ की प्रतिक्षा किए
छोड़ देंगे
निश्चय ही
उस दिन आप
अकेले ही
समय के रथ को
सही दिशा में
मोड़ देंगे ।
***

मां-एक
मां,
मां का संबंध
मनुष्य के शरीर से नहीं
उस की आत्मा से होता है ।

मां,
मनुष्य की जीवन-जड़ी होती है
तभी तो
अपने अंतिम समय में
मां को पुकारता है
मनुष्य ;

सचमुच मां
भगवान से बड़ी होती है ।
***

मां-दो
मां
सांस है
यह शब्द है
या मंत्र है
      जाने क्या है ?

इस के तो उच्चारण से ही
हृदय भरने लगता है ।

मां
मेरी समझ में
ध्यान की कोई विधि है
इस के तो
स्मरण मात्र से ही
अमृत झरने लगता है ।
***

आग
आग
ये जो चूल्हे में जल रही है
आग
लोगबाग
इस एक ही रट को लगाए हुए हैं
कि जल रही है
परंतु
मैं कहता हूं
जितना यह जल रही है
उतना ही
जलने से टल रही है
जलता तो
जंगल है
मंगल है
मनुख (मनुष्य) है
इस के सुख ही
सुख है
छल रही है
उत्पति को
निगल रही है
और दिन ब दिन
अजगर की तरह पल रही है ।
***



अनुवाद : नीरज दइया

मोहन आलोक (3 जुलाई, 1942) राजस्थानी के प्रमुखतम हस्ताक्षर हैं । उनके कविता संग्रह 'ग-गीत' को १९८३ का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तथा यह संग्रह इसी नाम से नीरज दइया द्वारा अनूदित तथा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित भी हुआ है । मोहनजी राजस्थानी में प्रयोगशील कवि के रूप में 'डांखळा' तथा 'सोनेट' विधा के जनक हैं । उनके द्वारा रचित पर्यावरण पर महाकाव्य 'वनदेवी अमृता' अंगेजी में 'द गोंडेस ऑफ़ फॉरेस्ट' शीर्षक से प्रकाशित और चर्चित । आपने पालि- धम्मपद का राजस्थानी पद्य में रूपान्तरण किया है और शानदार रूबाइयां 'आप' भी लिखी हैं ।

2 comments:

  1. वरिष्ठ राजस्थानी कवि मोहन अलोक जी की राजस्थानी कविताओं का डॉ. नीरज दईया द्वारा किया गया अनुवाद ...कवितायेँ मूल हिंदी की ही महसूस होती है..इतने सटीक और सहज अनुवाद के लिए डॉ. दईया को हार्दिक बधाई..

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  2. namskaar !
    nav varsh ki aap ko bahut bahut badhai , shree aalok mahan je kavitae behad achchi lagi aur shree madan gopal laddha jee ka anuwad saango pang laga . aap dono shree ko sadhuwad , bdhai .aabhar!

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