जुगल परिहार की कविताएं

राजस्थानी कविता

जुगल परिहार
25 अप्रेल, 1954 को जन्म। राजस्थानी और हिंदी में 1973 से लगातार लेखन और प्रकाशन। अब तक विविध विधाओं में अनगिनत रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। सन् 1980 से पत्रकारिता से जुड़ाव। राजस्थानी पारिवारिक मासिक ‘माणक’ के सहायक संपादक के रूप में 35 वर्षों से संपादन-कार्य तथा ‘दैनिक जलतेदीप, जोधपुर’ से भी विगत 15 साल से उपसंपादक के रूप में सम्बद्ध। नीतिपरक कथात्मक स्तंभ ‘दसवां वेद’ की लगभग छह हजार से अधिक किश्तें ‘दैनिक जलतेदीप’ में प्रकाशित। अनेक पुरस्कार एवं मान-सम्मान। पता- 17/195, चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, जोधपुर (मोबाईल 9251964112)

दुख क्यों होता है?

बुझने का इतना गम नहीं
जितना कि है गम
इस तरह जलने का!
जो कि जलने वाले हैं
उन सब को
समय आने पर
एक ना एक दिन
बुझना तो है निश्चित
फर्क बुझने में नहीं है
फर्क है तो फकत जलने में
यही कारण है कि
हृदय में हरदम
महसूस होता है-
यह इस तरह क्यों हुआ?

कितना सार्थक है
एक दीप का जलना!
रात-भर
एक सहज गति से
होले-होले
जलता रहता है
क्षण-क्षण तेल खूटता
पर जरा-जरा-सी
बाटी भी जलती
पर तिल-तिल कर...

सरुआत में
कितनी तेजी होती है-
उस के जलने में
कितनी जवान होती है-
उसकी लौ
उसकी आंच
उसकी रोशनी!
निकटता से
जैसे भस्म हो जाएंगे
पर समय के साथ
अवस्था के हिसाब से
धीमी-धीमी
वही लौ
वही आंच
वही रोशनी
कम होती जाती है

और पहुंचती एक अंतराल के बाद
वही उसी दशा में
जो कि होती है
बुझने के समय-सी!
उस समय बाट
चड़-चड़ कर के
जैसे उसकी घोषणा करती
यही वजह है कि
बुझने की वेला एकाएक
नहीं महसूस होता घोर अंधकार!

पर जलना यकायक
भभकै के साथ-
हफड़-हफड़
और बुझ जाना
क्षण भर में
-कितना नागवारा होता है!

एक हफड़का
और उसके बाद
चारों तरफ
अंधेरा ही अंधेरा!
बहुत देर तक
उस अथाह समंदर में
गोते लगाती दृष्टि
किसी सहारे की बाट देखती!

दुख क्यों होता है?
जो कि बरसों से
मेरे हृदय के
भीतर-ही-भीतर
गहराता रहा है
मेरी जिंदागी में
आज तलक
कितने ही ऐसे चांस आए
जब कि मैं
इस सवाल का जवाब
सिर्फ मौन के
कुछ नहीं दे सका
पर आज-
जब कि मेरे ये आंखें
दूर-दूर तक गहराए
उस अंधियारे में
कुछ देखने योग्य हुई है
-मुझे लगता है कि
मेरे पास एक जबाब है!
 
००००
 
अब नहीं उगते कैक्टस में हाथ
बचपन में मना करती थी
कहा करती थी माँ -
‘मत मार बहन को
पाप लगेगा रे, पाप
देख, वह देख
वो काँटों वाला कैक्टस
उगा करते हैं उस में
पापी हाथ’
बच्चे डरते थे तब
लेकिन अब?
अब तो डरता नहीं कोई भी
हाँ, उगते थे कभी,
लेकिन अब नहीं
उगते कैक्टस में हाथ....
००००
अनुवाद: नीरज दइया


No comments:

Post a Comment