मदन गोपाल लढ़ा की कविताएं


महाजन (लूनकरनसर) बीकानेर में 2 सितंबर 1977 को जन्मे डॉ. मदन गोपाल लढ़ा युवा कवि-कहानीकार के रूप में विख्यात हैं। हिंदी में “होना चाहता हूं जल” कविता संग्रह प्रकाशित। इन दिनों आपका राजस्थानी कहानी संग्रह “च्यानण पख” चर्चा में है, आपके प्रथम कविता संग्रह “म्हारै पांती री चिंतावां” पर कमला गोइंका फाउंडेशन से किशोर कल्पनाकांत पुरस्कार मिला। संप्रति राजस्थान शिक्षा विभाग में व्याख्याता।


कौन है वह

दुनिया के

हर गांव में

अवश्य ही मिल जाएगा
आपको कपड़े सिलते दर्जी
बाल कतरते नाई
और घर संवारते कारीगर।

दुनिया के
हर घर में
आपको मिल सकता है-
काच-कंघा
और तेल-इत्र।

सुंदरता की चाहत
मनुष्य का
आदिम स्वभाव है
पर कौन है वह
जो जब चाहे
मिट्टी, धुंए और आग से
बदरंग कर जाता है
मनुष्यता का चेहरा !
००००

खुशबू
रक्त-संबंधों से
कमतर नहीं होते
आत्मा के आत्मा से रिश्ते।

धर्म, भाषा
और भूगोल के भेदों से
बहुत बड़ा होता हैं
आत्मा का आंगन
जहां किसी दीवार से
रोके नहीं रुकती
भावों की खुश्बू।

चार सौ कोस के अंतराल से
क्षण भर में आकर तुमने
बोया मेरे हृदय में
पिता-पुत्री का स्नेहिल पौधा
तब यकीनन
उसकी खुश्बू से
जगमगा उठा
ये जग-जीवन मेरा।
००००

मौन का अर्थ
फकत “हां” नहीं होता
मौन का अर्थ
होता है- विरोध भी।
मन में गूंजते हैं-
विरोधी स्वर
नहीं, नहीं मैं शामिल नहीं
तुम्हारे दल में
छल में...
अलग हूं-
कुछ अर्थों में तो हूं
आमने-सामने।

मौन में
मुट्ठियां कसी जा सकती है
रक्तिम हो सकती हैं आंखें
सहमति के स्थान पर
हिल सकती है गर्दन
विरोध में।
००००

सच्चा सच
कोई थिसारस
यदि अब हो प्रकाशित
“स्त्री” पर्यायवाची-समूह में
शामिल करना “नहर” को।

एक जैसी ही होती है-
दोनों की जीवन-यात्रा
स्त्री की आंखों में पानी
और नहर के लिए
बस पानी ही जीवन
उम्र भर सहना और बहना
और जब-तब
सूख जाने का खतरा।

नदीगर्भा
और नाम नहर....
स्त्रीलिंग होना
महज संयोग नहीं
सच्चा सच है।
००००

अनुवाद : नीरज दइया

मेरे हिस्से की चिंताएं
मुझे सवेरे उठते ही
चारपाई की निवार खींचनी है।
पहली तारीख में अभी सत्रह दिन शेष हैं
किन्तु बबलू की फ़ीस तो भरनी ही होगी।
पत्नी के साथ, रिश्तेदारी में हुई गमी पर जाना है।
कल डिपो पर फिर मिलेगा मिट्टी क तेल।
मैंने यह भी सुना है कि
फ़ीका पड रहा है ताजमहल का रंग।
सिरहाने रखी पुस्तक की मैंने
अभी आधी कविताएं ही पढी हैं।
***

कविता की ताकत
कविता
नहीं करा सकती बरसात
कविता
नहीं उगा सकती सूरज
कविता
नहीं भर सकती पेट।
किंतु कविता
अवश्य बता सकती है रास्ता-
पानी लाने का
रात गुजारने का
भूख मिटाने का।
***

अनुवाद: नीरज दइया

युवा कवि मदन गोपाल लढ़ा का प्रथम कविता संग्रह "म्हारै पांती री चिंतावां" चर्चित । 
 

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