श्याम महर्षि की कविताएं

कविता : एक
कविता
गोली नहीं है नीद की…
नहीं है वह
गोली बंदूक की !

कविता तो
मेरे मन की खुराक है
कदमों का पड़ाव है
मेरी कविता !

कौन जाने यह पड़ाव
मेरी जिंदगानी के
पूर्ण-विराम से
कुछ अलग-थलग है ।

वहां तक पहुंचने के लिए
मुझे करने पड़ते हैं सवाल
जिनका जबाब
इस दुनिया को देना है ।
***

कविता : दो
कविता आग नहीं है
जिस से लोग
सेक सकें रोटी
और नहीं है वह कोई वस्त्र
कि जिस से
किसी का नंगापन ढक जाए
कविता औरतों के गीत भी नहीं
जो कि गली गली में गाए जा सके ।

कविता मेरे भीतर के
आदमी की जुबान है
और है मेरे मन की पुकार
कविता अब करायेगी पहचान
भूख और रोटी की
कविता तो बस छाया है कवि की ।
***

संगत
घर का पालतू कुता
चाटते-चटते मेरा हाथ
लगा है अब गुर्राने
उसकी संगत कुत्तों के साथ कम
और हो गई है अब
आदमियों के साथ अधिक

कुत्ता हो गया है सयाना
वह काटने की जगह
लगा है आजकल गुर्राने
शायद वह जान गया है-
डराने के लिए जरूरी नहीं काटना ।
***

वह
वह कल तक
चेजे पर जाता था
और बन रही हवेलियों के नीचे
सो जाता हो कर बेफिक्र

वह करने जाता था मजदूरी
किसी मिल में
पर सोता था अपनी नींद
या फिर जागता अपनी नींद

आज वही खड़ा था
मेरे सामने ताने मुट्ठियां
कारण मैंने लिखी थी
एक कविता उस के लिए

उस ने पढ़ी मेरी कविता
और आ पहुंचा लड़ने
तान कर अपनी मुट्ठियां
जो कल तक नहीं जानता था
नित्य नई बन रही हवेलियों
और मिलों की ऊंची होती
चिमनियों के रहस्य

कल तक वह
शायद जानता नहीं था
अपने के पसीने की कीमत
वर्ना कब का वह आ चुका होता
मेरे सामने
खुली सड़क पर
तान कर मुट्ठी

वह कविता से अधिक मुझे
और मुझ से अधिक कविता को
गहरे तक जानता है !
***

न्याय
कव्वै को कव्वा
सारस को सारस ही रहने दीजिए
चाहे किसी का प्रियतम आए
महलों में या फिर किसी का बीर
पधारे घर को ।

इन पर होना क्रोधित
या जाहिर करना खुशी
दोनों ही बातों का अर्थ
उन्हें मालूम नहीं ।

बिल्ली का रास्ता काटना
गधे का किसी दिशा में चलना
सुगन-पक्षी का कुछ बोलना
कोई सुगन नहीं है
ऐसा मानना कहां है न्याय-संगत ?

इस धरती के
और धरती पर बिखरी
पूरी प्रकृति के
है मालिकाना हक
क्या सिर्फ मनुष्यों के ही ?
नहीं, यह सब हमारा नहीं
इनका और उनका, है सभी का ।
***

विरासत
गिरवी पड़ा है खेत
झूमर सेठ का रुक्का
बहन मालती के पीले-हाथ
करने हैं शेष
पड़ोस से मुकदमा
और अनगिनत
आडी-टेडी जिम्मेदारियां
सौंप गए हैं मेरे बाबा ।

याद आती है
बचपन की
वे दिन जब इसी आंगन में
होता था खेलना-कूदना और खिलखिलाना ।

बाबा का अपरिमित स्नेह
और बड़ी मां का दुलार
जो मिला इस आंगन में
कब भूला हूं मैं !

अब इस घर में
कहीं दब गई हैं-
गाय-बछड़ों की आवाजें
सुनता हूं मैं
मिल का बेसुरा भोंपू ।
दूध-दही और घी
शौक बन चुके है-
दिल्ली की बड़ी बस्ती के
और मेरे लिए सपना ।

मोहन बाबा के हुक्के की गुड़गुड़ाहट
और रुघे काका से बतियाना उनका
अब कहां सुन सकूंगा इस घर में
जहां सुनाई देती है अब स्टोव की सूंसाट
बाजरे की रोटी की सुगंध
छीन ली किसी ने आंगन से ।

पुस्तैनी घर यह मेरा
बहुत सालों से जो था अपना
बिना उन के लगता है-
बहुत ही पराया ।
***   

अनुवाद : नीरज दइया


कवि श्याम महर्षि (7 अटूबर, 1943) राजस्थानी साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका राजस्थाली के संपादक के रूप में विख्यात हैं साथ ही आप गत पचास वर्षों से सक्रिय राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, श्रीडूंगरगढ़ (बीकानेर) के आधार स्तंभ रहे हैं । अनेक लेखकों-कवियों को तैयार करने में आपकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है वहीं आप के राजस्थानी हिंदी में अनेक मौलिक कविता संग्रह, संपादित संग्रह तथा अनुवाद-ग्रंथ भी प्रकाशित हुए हैं । अनेक पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित । राजस्थानी के चर्चित काव्य संग्रह- उकळती ओकळ, साच तो है, मेह सूं पैल्या और सोनल रेत रो समंदर हैं । 

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