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मालचंद तिवाड़ी की कविताएं

उबारता उजियारे तुम्हारे
अथाह अंधकार में
तुम मेरे हाथ लगी
सुलगी मंद्र आंच
निपट भोली-भाली मोमबत्ती ।

अथाह अंधकार
अभी तक बढ़ता जा रहा हूं मैं
उबारे हवा से तुम्हारी जोत
उबरता खुद उजियारे तुम्हारे
पैरों लिपटती विपदाओं से !
***

अंतिम दिन यह दुनिया
कविता होगी
अंतिम वृक्ष
प्रीत के मरुस्थलों
निपजेगी केवल प्रीत
चिड़िया लेगी फिर विश्राम
वृक्षों की रेशमी छाँव में ।

पहले दिन की तरह
अंतिम दिन यह दुनिया-
फिर से तेरी मेरी होगी ।
***
मैंने नहीं दिया उपहार में शब्दकोश
हो सकते हैं थोड़े से
पुष्प की पंखुड़ियों जितने
या फिर अनगिनत
किसी महल में लगे पत्थरों जितने
शब्द-तुम्हारे और मेरे बीच ।

नहीं बनता पुष्प
न ही महल
ऐसे अर्थहीन शब्दों का हम क्या करें ?

इसी कारण
मैंने नहीं दिया उपहार में शब्दकोश तुम्हें
इसी कारण
मैं लौट आता हूं बहुत बार
अबोला तुम्हारे आंगन से ।
***

पाना-चुकाना
पढ़ाता हूं क्लास में
क्या है एसेट्स
क्या लायबिलीटीज
विचार करता हूं-
तुम क्या हो मेरे लिए ।

क्या तुमसे पाना है
कि कुछ चुकाना है ?

यदि पाकर चुका कर
पार उतरना है
तो किसके
अपने या तुम्हारे ?
***


थके हुए शब्द
पर्दा उठाओ
प्रेक्षागृह में चिल्लाया कवि
अकेला बैठा था-
      रंगसाला में
कौन उठाता पर्दा ?
शब्द थे
कवि ने दी
उन्हें बहुतेरी सियर्सल
करना था शब्दों को नाट्य
उठाना था पर्दा-
      अर्थ से ।
वे ही दौड़े
जिनमें, जिनको, जो भी
करना था अभिनय
      नहीं हुआ ।
अखिर कवि ने किया
शब्दों का नाट्य
कवि ने देखा
नाट्य देखते
      थके हुए शब्दों को ।
***

ताकते मुंह तुम्हारा और मेरा
काश ! यदि शब्द नहीं होते
तुमसे और मुझ से पहले ।

अक्षरों की तरह
हम भी जुड़ कर होते
सृष्टि का पहला शब्द ।
रचते अर्थ
पहला पद
पहला पदार्थ ।
नहीं पहचानते हमें जगत के बातूनी
तकते मुंह तुम्हारा और मेरा ।

हम उस शब्द में साथ मुस्कुराते
जैसे अवश्य मुस्कुराते होंगे
विद्वानों को माथा-पच्ची करते देख कर
ढाई-आखार !
***

इस तरह रखा तुमने
ठंडी-ठर लाल सुर्ख नाक
खोज रही थी गर्म उष्मित देह
नर्म-धवल खरगोशों की ।
खरगोश ले रहे थे विश्राम
तुम्हारी छाती की आंच में ।

थरथराती अंगुलिया तुम्हारी
उतर रही थी भीतरी परतों तक
बाहों में आए दरख्त के ।

सहला रहा था दरख्त तुम्हें
अपनी एक-एक डाल से
सहसा छोड़ दी जड़े
गूंगी चित्कार के साथ ही
यश है तुम्हें
तुमने नहीं लगने दिया धरती के
एक भी पात बेचारे दरख्त का ।

सहेज ली सम्पूर्ण धरा
सहेज लिए साथ ही
तुमने तुम्हारे किसी गहरे पानी में-
सम्पूर्ण दरख्त ही धरती के ।
इस तरह रखा तुमने
हमेशा अक्षत सृष्टि को ।
***

नगर के नथुनों में पहुंचे प्राण
(अशोक वाजपेयी का काव्य-पाठ सुनने के बाद)
कर्फ्यू था
खुशबू लापता ।

हवा में गश्त थी
समकालीनता की ।

आलोचना के फौजी
ले रहे थे घर-घर तलाशी ।
यशस्वी नहीं था कवि
सौंपने से पहले बयाज
सूंघने पर खुशबू नहीं आई
उस में जनरल साहब को ।
किया कवि पर उपकार
फेंक दी खिड़की से बाहर !

हवा में हिल-मिल गई खुशबू
नगर के नथुनों में पहुंचे प्राण ।

अभी भी चालू है-
समकालीनता ख़ी पेट्रोलिंग तो !
***

अग्नि-1
दाह नहीं है अग्नि
स्पर्श है उजियारे का

जलताहै उतना
जितना अंधेर है

जलता है जो नहीं
लौटता फिर से
लौटी थीं जैसे
जानकी !
***

अग्नि-2
धैर्य नहीं है तुम्हारे
अग्नि

थकती नहीं तुम
नश्वरता पी-पी कर ?

लेकिन
बतलाओ तो अग्नि !
तुम नश्वरता को प्राण देती हो
या अपने लिए
नश्वरता के प्राण लेती हो ?
***

अग्नि-3
कहां होती है
जब नहीं होती
अग्नि !

जल
थल
नभ
हवा ?

अदृश्य नहीं होती अग्नि
दृष्टि में ही सो जाती है !
***

अग्नि-4
बिरहन है अग्नि
बाट जोहती
जल की !
जल जोगी
लौट जाता
अलख जगा कर
देहरी से ही
इस बिरहन की !
***

अग्नि-5
जलाती नहीं
पकाती है अग्नि
आंवें में घट
धरती में बीज
देह में आत्मा

अग्नि रचती है
जल-थल-नभ-वायु
घट में
बीज में
आत्मा में
खोजती हुई रास्ता
अपनी भास्वरता का !
***
  
अनुवादः नीरज दइया

मालचन्द तिवाडी (11 मार्च, 1958) राजस्थानी कवि-कथाकार हैं । आपका कविता संग्रह- उतरियो है आभो जिसे साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला के अलावा राजस्थानी में दो कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं । आपकी हिंदी में अनेक पुस्तकें प्रकाशित एवं चर्चित रही हैं । 

पारस अरोड़ा की कविताएं

कविता
यह मानचित्र है
यह सिया और अफ्रीका
अंगुली रखता हूं
और भर जाती है खून में
ऐसे समय मालूम चलता है
कि बुरे वक्त में
अच्छा पड़ौसी कितना काम आता है
मिल कर छूट जाए तो
बहुत याद आता है ।
***

हम अपमानित
बारम्बार
अपमानित हुआ हूं मैं
अपमानित हुए हैं आप
मेरे प्रियजनों !
हम में से जब भी कोई
आकर गाता है सड़क पर,
मांगा जाता है उस से इजाजतनामा ।
हम ने जब कभी
अंधेरे में
लूटने की मंत्रणा करते
चेहरों पर टार्च का प्रकाश किया
अदृश्य हाथों का निशाना बनी टार्च
हम जब कभी
किसी मंच से
उठाते हैं हमारी आवाज
हम अपराधी घोषित हुए हैं
हम पर
सिर्फ शब्द ही नहीं फैंके गए
फैंकी गई पूरी किताबें
चिपका दिए गए
हमारे शब्दों पर शब्द
ताकि कोई हमारे शब्द
सुने नहीं, पढ़े नहीं, समझे नहीं ।
जिस दिन उन को
सुनाई देंगे हमारे शब्द
फिर वे दूसरों की नहीं सुनेंगे ।
यदि किसी ने पढ़ लिए तो
कितनों को वह पढ़ा देगा
किसी ने समझ लिया उन्हें
तो उसके सामने
कई गर्दनें
अपना भार नहीं सभाल सकेंगे ।
***

क्या है तुम्हारा फैसला ?
इतना अंधेरा
कि चारों दिशाएं लुप्त
इतना उजियारा
कि आंखें चुंधिया जाए
बोल, बता मित्र
अब क्या कहता है-
दृष्टि डालने के लिए
कौनसी जगह शेष है ?
ऐसा करते हैं हम
बांध कर इस उजाले की पोटली
रख लें कांधे पर
अंधेरे को आमंत्रित करें
धर कूंचा… धर मंजला… चलें
चीर दें अंधेरे को
घर-घर बांटे
पोटली में रखा उजाला
इस लम्बी राह में खा-खाकर ठोकरें
पैरों में हौसला नहीं रहता
लेकिन टूटेगा नहीं
अब यह पाहाड़ सा पक्का फैसला
बोलो बताओ-
क्या है तुम्हारा फैसला ?
***

क्यों और किस के लिए
कई कई बार
पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले
दो पैर
      -बैशाखियों के सहारे क्यों ?

अनेकानेक
व्रज-आधात सहने वाला
एक सीना
      -क्यों उस में हृदय-प्रत्यारोपण ?

अंधेरे में ही
मीलों दूर स्पष्ट देखने वाली
दो आंखें
      -क्यों धारे पाषाणी-स्थिरता ?

आते युगों की
समास्याओं का समाधान लिए
एक मैकेनाइज्ड दिमाग
      -क्यों नहीं लगा सकता हिसाब
      खुद की जिंदगी का ?

क्यों एक रघुकुली
खड़ा है झुका हुआ
जगह-जगह से टूटा-बिखरा हुआ
जमाना
न जाने किस स्वतंत्रता के लिए
लगातार कर रहा है युद्ध ?
***

वह पहले जैसा नहीं था
पहले था, सब कुछ वह
वैसा तो नहीं था !
वृक्ष, घर और हवा
रहते थे सभी में
      लम्बा था दायरा ।

हवा बुहारती थी बहुत कुछ
भीतर का मौन भी
और शरीर के रोग
हवा में घुली थी औषधी
पत्ते ताली देते
गर्मी सहते
वृक्ष नाचते
उस से मिलने पर

नीपे-पुते-साफ सजे
वृक्षों के बीज अच्छे लगते थे घर
बातों में हो जैसे
घुला हुआ कोई नशा
जैसे पहले था सब कुछ
      वैसा कुछ नहीं था ।

अब लगती है- हवा
हवा ही नहीं
जैसे सांस में गड़ी हुई है कोई फांस
जिसे निकालना कठिन हो गया है
रोगी जैसे गूंगे खड़े
      वृक्षों की शाखाएं कटी हुई
कहने को रहने भर को घर-वर है
डर है कि इसे भी ठूंठ न दबोच ले
      कहीं हवाएं ही न नोच लें ।

ऐसा क्यों है अब
क्यों कुछ पहले जैसा नहीं
कहां है वह
      जो रहता था यहां
हर तरफ मौन क्यों फैला है ?

लोगों ने कहा-
      पता नहीं कहां गया, यहां नहीं है
वह फलों-फूलों से लदा
घेर-घुमेरदार वृक्ष था
      हवाओं की खुशबू था
      आंगन की छाया था

लोगों की आशा था- चला गया
काले कारनामों वाले
उजले आकारों से छला गया
चला गया-
थका तो पुनः जोर जुटाने चला गया
आंखों में रक्त का सौलाब लिए चला गया
जाते-जाते छलने वालो के सामने ऐसे तना
एक-एक के हृदय में
      जैसे कोई भुजंग सिर उठाए 

कुछ सूखी हड्डियां जानती हैं
वह कहां गया होगा ?
वे कहती हैं-
वह हवा तूफान को लाने गई होगी
वह भोले आदमियों को समझाने गया होगा-
सूने घर की रौनक लाने,
कटे वृक्ष की प्रतिष्ठा जमाने

सच कहते हैं-
पुन: लौटने की सोच कर गया होगा
लेकिन उस समय
आदमी तो वही था
      लकिन वह पहले जैसा नहीं था ।
***

अनुवाद : नीरज दइया

कवि पारस अरोड़ा "राजस्थानी-1" नई कविता की आरंभिक पत्रिका के कवि हैं । राजस्थानी में आपके तीन काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं । आपने "अंवेर" कविता संकलन का संपादन किया, जो राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर से प्रकाशित-चर्चित । "अपरंच" नामक साहित्यिक पत्रिका के अतिरिक्त लोकप्रिय मासिक पत्रिका "माणक" के लिए भी कार्य किया । 

रामस्वरूप किसान की कविताएं

आ बैठे बातें करें
आ बैठे बातें करें
एक दूजे को देखें

कितने वर्ष बीत गए
साथ-साथ रहते हुए,
कितने क़रीब-क़रीब रहे हम
किंतु देख नहीं सके-एक दूजे को

झूठ नहीं कहता
मैं तो नहीं देख सका
तुम्हारी तुम जानो ।

भोगा अवश्य है
तुम्हारा अंग-अंग
किंतु देख नहीं पाया
ठुड्डी का तिल / जिसका रंग
मेरी अनभिज्ञता के अंधकार में जा मिला

क्षमा करना
अवकाश ही नहीं मिला
ये दांत कब टूट गए तुम्हारे ?
और ये सफ़ेद बाल ?
आ बैठ, ग़ौर से देखूं तुझे
कहीं इसी दौड़-भाग में
यह ज़िंदगी भाग न जाए ।
***

इकलौता बैल
जेठ का तपता दिन
तंदूर की भांति
सिकती साल (कमरा)

सोई हुई हो तुम
नींद में निश्चिं
मेरे पास ही चारपाई पर

मैं लिखता-लिखता
देखता हूं तुम्हारी ओर
सिर से पसीने की लकीर
कान के क़रीब से होती हुई
छाती की तरफ़ जाने को है तैयार
सारस जैसी लंबी गर्दन पर
नस फड़क रही है
सांसों का अरहट चल रहा है
निरंतर

इसी बीच
कभी-कभार तुम बुदबुदाती हो
शायद कोई स्वप्न सता रहा होगा
जिसमें चुभ रहा होगा
गृहस्थी की गाड़ी का जूवा
तुम्हारे कांधे पर ।
क्योंकि तुम
इकलौता बैल रही हो
मेरी प्रिय आनंदी
बैल तो मैं भी हूं
पर बेकार बैल
जो जागते हुए भी
लिख रहा है कविता
और तुम हो
जो नींद में भी
खींच रही हो गाड़ी ।
***

अनुवाद : नीरज दइया

रामस्वरूप किसान (14 अगस्त, 1952)  हनुमानगढ़ जिलै के परलीका गांव में रहते हैं । कवि कथाकार के रूप में  चर्चित किसान पेशे से भी किसान हैं और रक्तकरबी के राजस्थानी अनुवाद हेतु आपको साहित्य अकादेमी सम्मान भी मिला है । आठ पुस्तकें प्रकाशित ।  

मोहन आलोक की कविताएं

कविता
कविता कोई पत्थर नहीं है
कि आप मारें
और सामने वाला हाथ ऊंचे कर दे
साफा उतारे
और आप के पैरों में
रख दे ।

कविता का असर
तन पर नहीं
मन पर होता है
मन की जंग लगी तलवार को
यह
पानी दे-दे कर धार देती है
उसे धो-पोंछ कर
नए संस्कार देती है

यह वक्त के घोड़ों को लगाम
और सवारों के लिए
काठी का बंदोबस्त करती है
यह हथेली पर
सरसों नहीं उगाती
बल्कि उसे उगाने के लिए
जमीन का बंदोबस्त करती है ।
***

रचना
वह रचता है
और जब रच देता है
तो उस रचना में
रचने के लिए -
कुछ भी शेष नहीं बचता है ।

हो सकता है
वह रचना
आपको अधूरी सी लगती रहे
और उसकी पूर्णता हेतु
आपके भीतर
कोई जिज्ञासा जगती रहे ।
हो सकता है
आप किसी अन्य रचना के साथ
उसका मिलान करते रहें
और यों
अपने आपको नाहक परेशन
करते रहें ।

लेकिन वह रचना
जैसी भी होती है
जोअ भी होती है
पूरी होती है ।

कोई भी रचना
किसी अन्य रचना के सदृश्य
कब जरूरी होती है ?
***

शब्द होती है कविता
शब्द
जब असमर्थ हो जाते हैं
अर्थ देने में
तो पंक्ति रची जाती है

पंक्ति,
जब व्यर्थ हो जाती है
भावना की भूमि पर
तो कहानी कही जाती है

कहानी,
जब कह नहीं पाती है
अपने भीतर की कहानी,
तो कविता आती है
और अपने
बिम्बों,
प्रतीकों,
उपमाओं के माध्यम से
अर्थ को पहुंच कर
एक शब्द बन जाती है ।
***

कविता में
कविता में
ढूंढ़नी हो यदि आपको
कोई गहरी चीज

तो कमीज
उतारो और लगाओ उस में
एक डुबकी

डुबकी,
तो आपको आएगी
जब आप की गर्म-मिजाज देह
कविता के
ठण्डे पानी में जाएगी ।
पर डूबो आप
जितनी देर डूब सकते हो
इस ताल में
सांस रोक कर कपाल में,
और जाते रहो
शब्दों की श्रृंखला पकड़ कर
गहरे
गहरे
और
गहरे,
कि आपको वापिस निकलने का
ध्यान ही न रहे
और आपका मन
आप कविता में हैं
यह भी न कहे ।
***

शांति गीत
आओ ।
हम एक शांति गीत
गुनगुनाएं
और गाते-गाते
इतिहास बन जाएं ।
एक ऐसा इतिहास
लिसके सामने
सूरज की रोशनी भी
मंद हो जाए
एक ऐसा इतिहास
जिसके बाद
इतिहास बनना ही बंद हो जाए ।
***

चिड़या की बोली लिखो
चिड़या की बोली लिखो
फूल का रंग लिखो
निःशब्द ।

कलम कोअ आंखों से पकड़ो
बनाओ
आकाश को कागज ।

नजर को तीर की तरह गड़ाओ
और बींध दो
बादलों के पीछे के
बादल
उन बादलों के भी
पार के बादल ।

चिड़या की बोली लिखो
फूल का रंग लिखो
निःशब्द ।
***

फूल के करीब जाइए
फूल के करीब जाइए
और उससे
अपने मन की बात कहिए
जबाब आने की प्रतीक्षा कीजिए
कुछ देर को
उसके पास बैठे रहिए ।

वह अपनी
मिल-बतियाने की भूख को
निश्चय ही शांत करेगा
बहलाएगा आपका मन
आपसे बात करेगा ।

एक बार कभी
आप उसकी बात सुनकर तो द्रेखें

उसके चतुर्दिक मंडराते मौन को
गुनकर तो देखें ।
हो सकता है
शुरू-शुरू में आपको लगे
आप बेवकूफ बन रहें हैं !
तब भी आप
एक बार यों बेवकूफ बनकर तो देखें ।
***

हम कला के पारखी
शिल्प पूजते हैं
शिल्प में ढली
सर्जना पूजते हैं,
हम कला के पारखी
पत्थर कब पूजते हैं ?

सत्य पूजते हैं
हम मनुष्य की साधना पूजते हैं
सत्य को साकार करती हुई
उसकी कल्पना पूजते हैं ।

हम कला के पारखी
पत्थर कब पूजते हैं ?
***

ख्याल
यह जो हम
दिन ब दिन
नीचे से नीचे की ओर
      जा रहे हैं
इससे स्पष्ट है
कि कहीं ऊंचाई से आ रहे हैं ।
ये ऊंचाई
जो कि उजालों की ऊंचाई है ;
दरसल
हमारे ख्यालों की ऊंचाई है ।
और ये ख्याल
हमारे कवियों
साहित्यकारों के
खून पसीने की कमाई है ।
***

मैं हूं जब तक
मेरी कविता और
आप के बीच में
मैं हूं जब तक !
यह, आपको मुश्किल से ही
पसंद आएगी तब तक ।

अभी मैं
नश्वर और अनश्वर के बीच में
एक दीवार हूं
कविता से पहले
आपके सामने एक प्रश्न हूं
प्रश्न !
जो आपकी सोच को
प्रभावित करता है एक हद तक ।
जब मैं नहीं होऊंगा
तो यह, आप की चीज हो जाएगी
आप इस में खो जाएंगे
यह आप में खो जाएगी ।
अर्थ ढूंढेंगे आप
इस के एक एक शब्द के लिए ।

जब तक इसके साथ
इसके मेरी होने का विचार
जुड़ा हुआ है
तब तक
यह समझना चाहिए
कि एक विकार जुड़ा हुआ है
यह विकार है
कौन जाने कब तक ?
***

रो कवि, रो !
रो भाई, रो
लगातार रो
जैसे कि हम रो रहे हैं-

रात को, दिन को
अंधेरे को, उजाले को
गर्मी को, पाले को
अमीय को, विष को
तृप्ति को, तृष्णा को
रो
कि रोना ही
अपनी नियति है

रो
कि इस रोने में ही
मनुष्यता की गति है
रो !
कवि रो !!
कि तुमहारे रोने में
और आम आदमी के रोने में
बहुत फर्क है

रो !
कवि रो !!
कि तुम्हारे रोने से ही
सुरक्षित है
आने वाली पीढ़ियों का हर्ष ।
***

आप
आप क्या सोचते हैं
कि आप के करने से
कुछ नहीं होगा !
और यह हवा
जैसे बह रही है
वैसे ही बहती रहेगी ?
तो सुनों !
आपका यह सोचना ही
इन सब बुराइयों की जड़ है ।
आप ही हैं
इन सब बुराइयों के शीर्ष पुरुष
शेष दुनियां तो धड़ है ।
आप जैसे
एक-एक-एक
मिलकर ही हुए हैं ये अनेक
मनुष्य के कलेजे के छेक ।

आप एक !
सिर्फ एक !!
जिस दिन इन बुराइयों को
बिना किसी के
साथ की प्रतिक्षा किए
छोड़ देंगे
निश्चय ही
उस दिन आप
अकेले ही
समय के रथ को
सही दिशा में
मोड़ देंगे ।
***

मां-एक
मां,
मां का संबंध
मनुष्य के शरीर से नहीं
उस की आत्मा से होता है ।

मां,
मनुष्य की जीवन-जड़ी होती है
तभी तो
अपने अंतिम समय में
मां को पुकारता है
मनुष्य ;

सचमुच मां
भगवान से बड़ी होती है ।
***

मां-दो
मां
सांस है
यह शब्द है
या मंत्र है
      जाने क्या है ?

इस के तो उच्चारण से ही
हृदय भरने लगता है ।

मां
मेरी समझ में
ध्यान की कोई विधि है
इस के तो
स्मरण मात्र से ही
अमृत झरने लगता है ।
***

आग
आग
ये जो चूल्हे में जल रही है
आग
लोगबाग
इस एक ही रट को लगाए हुए हैं
कि जल रही है
परंतु
मैं कहता हूं
जितना यह जल रही है
उतना ही
जलने से टल रही है
जलता तो
जंगल है
मंगल है
मनुख (मनुष्य) है
इस के सुख ही
सुख है
छल रही है
उत्पति को
निगल रही है
और दिन ब दिन
अजगर की तरह पल रही है ।
***



अनुवाद : नीरज दइया

मोहन आलोक (3 जुलाई, 1942) राजस्थानी के प्रमुखतम हस्ताक्षर हैं । उनके कविता संग्रह 'ग-गीत' को १९८३ का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तथा यह संग्रह इसी नाम से नीरज दइया द्वारा अनूदित तथा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित भी हुआ है । मोहनजी राजस्थानी में प्रयोगशील कवि के रूप में 'डांखळा' तथा 'सोनेट' विधा के जनक हैं । उनके द्वारा रचित पर्यावरण पर महाकाव्य 'वनदेवी अमृता' अंगेजी में 'द गोंडेस ऑफ़ फॉरेस्ट' शीर्षक से प्रकाशित और चर्चित । आपने पालि- धम्मपद का राजस्थानी पद्य में रूपान्तरण किया है और शानदार रूबाइयां 'आप' भी लिखी हैं ।