Pages

Showing posts with label भगवती लाल व्यास. Show all posts
Showing posts with label भगवती लाल व्यास. Show all posts

भगवती लाल व्यास की कविताएं

दर्पन और दृष्टि
दर्पन तो
उलझाता है
दृष्टि को
दृष्टि के पार
है जो सृष्टि
उसे छिपाता है
दर्पन का काम है
छिपाना ।

जहां तक पहुंचती है दृष्टि
वहां है दृष्टि ही दृष्टि
परे रहता है दृष्टि से-
दृष्य तो
यह संबंढ है
बहुत पुराना
दृष्टि और दृश्य का !

साफ करें
दर्पन के पीछे
जो छुपा है रोगन
बन जाएगा दर्पन-
पारदर्शी
ले जाएगा दृष्टि को वहां
जहां एक सर्वथा नई
अनदेखी सृष्टि
है प्रतीक्षारत
किसी दृष्टि में
बस जाने को ।
***


अनुवाद : नीरज दइया

कवि भगवती लाल व्यास (10 जुलाई, 1941) राजस्थानी कविता संग्रह “अणहदनाद” के लिए साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत हैं । अगनीमंतर, सबद-राग आदि कविता संग्रह प्रकाशित व चर्चित । आप राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी, बीकानेर की मासिक पत्रिका “जागती जोत” के संपादक भी रहें हैं । हिंदी में भी समान रूप से लेखन ।


Bookmark and Share