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नीरज दइया की कविताएं

मैंने सहेज कर रखी है
तुम्हारी स्मृति
अभी तक नहीं भूली
मुझ तक पहुंचने के रास्ते

मैंने सहेज कर रखी है
तुम्हारी स्मृति
अपने सपनों के सांग !

सीमाएं सदैव बदली
और कुछ बदले हम भी
पर इस बदलाव में
नहीं बदली, मेरे लिए-
तुम्हारी छवि
यदि बदल जाती
तो भूल जाती स्मृति-
मुझ तक पहुंचने के रास्ते ।
***
अँधेरा और बच्चा
डरता है बच्चा
अँधेरे से
डरता-डरता वह सीखता है -
नहीं डरना !

एक दिन
आता है ऐसा
भरी दोपहरी
बच्चा पहचान लेता है
उजास में अँधेरा ।

बच्चा
जब पहचान लेता है- अँधेरा
बच्चा बच्चा नहीं रहता
दबने लगता है
भार से
करने लगता है युद्ध
अँधेरे की मार से ।
***
शोर में
यहाँ वर्षों बाद
वापस लौटा हूँ
क्यों चाहता हूँ देखना -
वह घर-गली-आंगन
अब क्या लेना-देना
उस बीते वक़्त के निशानों से ।

सब कुछ बदल गया
जब बदलता है वक़्त
तब नहीं करता
किसी मन की परवाह ।

अच्छा है मित्र
तू पुष्ट कर रहा है कविता को
इस शोर में
तुम्हारे जैसों के दम पर ही
बुद्धुओं के सींग-पूँछ
अखंड हैं ।
लोग कविता को
बुद्धुओं के सींग-पूँछ समझते हैं !
***

तुम्हारे जाने के बाद
जब-जब तुम्हारी आँख से
झरे हैं आँसू
उन तक
पहुँचे ही हैं हमेशा
मेरी स्मृति के अदृश्य हाथ ।

तुम्हें उन का स्पर्श
हो या न हो
पर मैंने सदैव उठाया है
तुम्हारे आँसुओं का भार ।

तुम्हारे इंतज़ार में
तुम्हारे बाद
कुछ भी शेष नहीं है
तुम्हारे अदृश्य आँसुओं के सिवाय ।
***

अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा

अन्य कविताओं व परिचय के लिए कविता कोश देखें 



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