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बी. एल. माली ‘अशांत’ की कविताएं


सब हारेंगे – सब हारेंगे
हेली(आत्मा) मेरी !
नहीं मच सकेगा घमसान
धूल नहीं उड़ सकेगी आसमान
नहीं जीत सकेगा कोई युद्ध में
सब हारेंगे – सब हारेंगे ।

हेली मेरी !
अबकी बार नहीं देख सकेंगे युद्ध
नहीं लिख सकेंगे युद्ध की विगत
नहीं रच सकेंगे अब की कोई युद्ध के गीत
युद्ध के कवियों का अंत
इंतकाल वक्त के हाथों हो गया है ।

हेली मेरी !
होंगे नहीं कबई अब स्त्रियों के जौहर
नहीं लड़ेंगे अब कभी कबंध से
रणक्षेत्रों पर बस गया है आदमी
युद्ध नहीं होगा ।

हेली मेरी !
नहीं होगी लड़ाई
आदमी और आदमी के बीच
अणु-परमाणु हथियार लड़ेंगे
धरती-पाताल-आसमान में
नहीं जीत सकेगा कोई
सब हारेंगे – सब हारेंगे ।

हेली मेरी !
नहीं हकूमत के लिए कर सकेगा अब कोई
अश्वमेघ
नहीं मांड सकेगा कोई महायुद्ध
अब नहीं बन सकेगा कोई धरती का भूप
अब नहीं उगा ही रहेगा किसी की सत्ता का सूरज
सब जान चुके हैं हकूमत का अर्थ
सब जान चुके हैं लड़ाई के मायने
अपनी खाल से बाहर नहीं आ सकेगा कोई
सब बचाएंगे
बीज का बाजरा ।
***
काया भूखी दर्जिन है
हेली मेरी !
बांच ले तू धरती का श्रृंगार
गगन का दुख बांच ले
जीवन सृजन है ।

हेली मेरी !
सुख सूरतों की मंजिल चल
बता दे रास्ता सही बोलने वाला
सूरतें जग का दर्पन हैं ।

हेली मेरी !
हिंगलू के पलंग बैठ
सुना दे भीतरी बातें
काया भूखी दर्जिन है ।

हेली मेरी !
मनुष्य को निर्भय होने की सुध दे
वह बनाता है
जग को डूबोने के स्थल
अर्धराजन मांड कर बता दे
करतब मनुष्य-योनी के
जग-जीवन अर्पण है ।

हेली मेरी !
गगन-मंडल में पड़ गई है तरेड़
जीवन की सुध दे
निर्भय कर दे मनुष्य-जाति को

हेली मेरी !
रास्ता जीवन का बुहार
जीवन सृजन है ।
***
जीवन है जग का आधार
हेली मेरी !
जीवन है जग का आधार
मनुष्य को भूले नहीं बनेगा ।

भीतर उग आया है विध्वंश
मंडरा रहा है खतरा जीवन पर
मनुष्य सुन रहा है पूर्वी आवाजें
विध्वंध-राग बज रही है ।

हेली मेरी !
मनुष्य से दूर मत जाना
जीवन दे मनुष्य-योनी को
माया देख कर कंपित है जग सार
दूर है मनुष्य से सुख-स्वप्न
सांसों में खुशबू दे हे प्रगाढ़ सहेली ।

हेली मेरी !
सुख गठरी
ऊंचवा दे जग को
मनुष्य को दे दे
सपने सुहावने ।
कोयल गा रही है मृत्यु-राग
मोर कुरलाता है दिन-रात
विनाश हंस रहा है हड़-हड़ ।

हेली मेरी !
मनुष्य की बुद्धि की डोर पकड़
सच के रास्ते ले आ उसे
साथ की सहेली !
विध्वंध को गाड दे
कोयल को सुहानी आवाज दे
मृत्यु-राग को मृत्यु दे
धरती को निर्भय रखना

हेली मेरी !
जीवन है जग का आधार
मनुष्य को भूले नहीं बनेगा ।
***

रात अंधेरा लिए आती हाथ में
हेली मेरी !
अचरज में नहीं है आदमी
डूब डूबो रही है मानव-हेत
रात अंधेरा लिए आती हाथ में
कांस ऊगी हुई है धरती ऊपर
निपट अंधेरे के पड़ रहे हैं हाथ
चूक से नहीं चेतना लेता है आदमी
अंधेरी जोहड़ी लेगी भख !

हेली मेरी !
मुड़, बचाले मिनखजात को
जोग जगाएं अपूर्व भूत
बिड़द बचेगी तो ही
ज्योति दीपेगी

हेली मेरी !
युग के पीछे कीचड़ में है पैर
हाथ मवाद से गहरे लिपटे हुए
भयानक कहराहट लिए आवाज
बच्चे तुम्हारे डरेंगे !

हेली मेरी !
रात अंधेरा लिए आती हाथ में
आ, बचा ले मानव-जीवन ।
***


धरती कितना ढोती वजन
हेली मेरी !  
धरती कितना ढोती वजन !
आकाश कितना भारी हो गया !
तुम्हारे पांवों बांध दिए पत्थर
तुम कितनी दोरी चलती हो मेरी साथिन
तुम कितनी दोरी चलती हो मेरी काया की मंगेजन ।

हेली मेरी !
तुम्हारे लिए ही बनाई है
रेडियोधर्मी विकिरणें
बेसुध कर दी है तुम्हें
सूंधा कर सूंधनी
तुम्हारे भीतर लगी हुई है आग
परमाणु अस्त्र-शस्त्रों की
‘स्टार-वार’ की
तुम्हारी सूरत अलसा गई है मेरी साथिन
मुरदानगी छा गई है चेहरे पर
रौनक चर गई है बीसवीं सदी

हेली मेरी !
तुम देखो भीतर के फोड़े
मानवता की काया के भीतर उभरे हुए ।
भीतर ऊग आया है विध्वंध ।
भीतर जोत देख मेरी साथिन
भली-भांति देख !

हेली मेरी !
कच्ची कूंपल छोड़ दी जगह
विनास देख मुरझा गई है
कैसे पांघरेगी वह !
चिड़िया का चूंहचांट कौन सुने ?
वह रोती फिरती है बेचारी
सुनाती फिरे है जीवन-राग ।

हेली मेरी !
अनंत में उग आया है विध्वंश
कौन सुनेगा गायों का रंभाना
कौन देखेगा मग्न होते खरगोसों की किल्लोल
हिरनियों का हृदय कौन देखेगा ?

हेली मेरी !
तुम्हें सुनाई पड़ती है क्या कबूतरों की शांति-वार्ता
मुड़ता दिखाई देता है क्या तुम्हें आदमी
कहीं कोई बाज तो बैठे नहीं बतला रहे हैं ।
तुम भली-भांति देख लो !
हां, तुम भली-भांति देखो मेरी साथिन
कहीं कोई सिकरा (बाज) शिकार नहीं कर ले काया चिड़कली का
मुंह में ले नहीं ले समस्त वैभव
धरती का
तुम्हें दिखाई देती है क्या जीवन-पंखुड़ियां !

हेली मेरी !
शायद तुमने बहुत अर्से बाद देखें होंगे
ऐसे पुष्प-विमान विनास के
आसमान में टंगा विध्वंश
तुमने पहली बार देखा होगा
तुम्हें सुनाई देती है क्या जीवन-राग ?
मुड़ता दिखाई देता है क्या आदमी ?
मेरी साथिन ! तुम भली-भांति देख लो,
कहीं मौत नजदीक तो नहीं आ रही है
इस सृष्टि के ।
मुझे तो अब छाछ से भी डर लगने लगा है
बताओ तुम क्या सोचती हो ?
क्या देखती हो ?
क्या सुनती हो ?
***

अनुवाद : नीरज दइया



जन्म : 17 नवम्बर, 1948 लक्ष्मणगढ़ (सीकर)। शिक्षा : एम.ए. (अर्थशास्त्र), एल-एल.बी.। राजस्थानी के प्रख्यात लेखक। चर्चित पुस्तकें- ‘हेली म्हारी’ (कविता संग्रह), ‘किली-किली कटको’, ‘राई-राई रेत’ (कहानी संग्रह), ‘मिनख रा खोज’, ‘अबोली’, ‘बुरीगार निजर’ (उपन्यास), ‘माटी सं मजाक’, ‘तारां छाई रात’ (निबंध) आदि। सभी विधाओं में विपुल मात्रा में लेखन। अनेक पुस्तकें संपादन, साहित्य इतिहास-ग्रंथ, शब्दकोष, व्याकरण आदि की प्रकाशित-पुरस्कृत। स्थाई संपर्क- 3/343 मालवीय नगर, जयपुर (राजस्थान)

 

कुंदन माली की कविताएं



घर छोड़ते समय
जब-जब
निकलता है वह
संभालने अपनी
नौकरी और कामकाज को

घर के सदस्य
देने लगते हैं सीख
और माँ आशीष-
“पहुंचते ही वहां
लिखना कागद
राजी-खुसी का समाचार देना

सुना है
बहुत ज्यादा होती है
वहां सर्दी और गर्मी

ध्यान रखना
तबीयत का
ढंग की खाना खुराक
सहन कर लेना
यदि कोई निकाल भी दे
एक-आध गाली
रखना याद परदेश में
जा रहा है कमाने-खाने
युद्ध के लिए नहीं

ऊंचे सुर में
कभी मत बोलना
बड़े आदमियों से

प्यार-मोहब्बत रखना
पड़ौसियों से
कभी बिगाड़ना नहीं

सहना पड़े चाहे
चार पैसे का
नुकसान

कुल-कुटंब पर
नहीं करे कोई
थूं-थूं ।”

स्वभाववश
कहती है
बड़ी बहन-
“मत सहना
परदेश में दुख
जरूरत हो तो
मंगा लेना रुपए-पैसे

चलती है जैसे चल जाएगी
यहां तो अपनी गाड़ी
घर ही तो हैं
परदेश में थोड़े ही हैं

आते रहना
वार-त्यौहार
एकेला नहीं है तू
हम भी हैं
तेरे साथ जुड़े तेरे पीछे ।”

बस तक छोड़ने
चले आते है साथ
भाई और यार-दोस्त
होती रहती हैं
बातें और बातें

हम पहुंच जाते हैं
दुनिया-जहान के समाचारों में
उतरते जाते हैं-
स्मृति की गहरी घाटियों में

बातों ही बातों में
आ जाती है बस
अर बस में
पहुंच जाता है सामान

और वह
हो जाता है जल्दी से
बस में सवार

पलक झपकते ही
अपना स्थान
छोड़ देती है बस
खड़े रह जाते हैं
यार-दोस्त-भाई

खड़ा हो जैसे
कोई वट-वृक्ष
और उड़ गया हो
उस पर बैठा कोई
एक पक्षी !
***

घर छोड़ने के बाद
कपड़वंज आने के बाद
अधिक नहीं तो
दो सौ पचीस किलोमीटर
पीछे छूट जाता है उदयपुर

छूट जाते हैं
बंधु-बांधव
घर और गांव
अपने खेत और खलिहान
कच्चे-पक्के घर
टूटी हुई दुकान

छूट जाते हैं
बाग-बगीचे
चिड़ा-चिड़ी
घर के गमले
टेबल पर रखे फूलदान

छूट जाती हैं-
मिट्टी की मुस्कान
मांडे के गीत
होठों की हंसी
तीज और त्यौहार
एक का बिणज
दूजे का व्यापार

फिर-फिर लौटता
आता है याद
बचपन में जो सुना
माँ ने जो गाया गीत
गीत के बोल-
“बन्ना ओ…
दीपावली के दीप जले
और रेल गई गुजरात ।”

कौन जानता था
अपने ही गाँव
घर और देश में
आएगी वह रेल
रेल में बैठ कर
पड़ेगा जाना
माँ के बेटे को गुजरात

सच हो जाएंगे
माँ के गाए गीत के शब्द
इतने वर्षों बाद
और इस तरह !

सच हो गया
माँ का गाया गीत
नहीं हुई सच
दादी माँ की बात
जो कहा करती थीं-
“कम खाना गम खाना
घर छोड़ कर कहीं मत जाना !”
***

अनुवाद : नीरज दइया


कुंदन माली (14 अक्टूबर, 1957) राजस्थानी में कविता, आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में विख्यात नाम है । “सागर पांखी” कविता संग्रह पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का सूर्यमल मीसण शिखर पुरस्कार, “आलोचना री आंख सूं” पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार और गुजराती निबंध संग्रह- “गोस्टी” (उमाशंकर जोशी) के राजस्थानी अनुवाद के लिए भी साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं । राजस्थानी के साथ-साथ समान रूप से हिंदी में भी लिखना और अंग्रेजी पढ़ना एक दुर्लभ संयोग है । आपके साद्यप्रकाशित "अंजळ पाणी" कविता संग्रह की दो कविताओं का अनुवाद यहां प्रस्तुत किया गया है ।